Sunday, August 14, 2016

समर १९९९

गाडी अब तेजी से द्रास की ओर बढ़ चली थी। आशु अब पीछे की सीट पर जा बैठा। हल्का सा उनींदा ,रास्ते में मश्कोह ,बटालिक,करगिल के बोर्ड और ऊंचे पथरीले पहाडो के दृश्य उसे १७ वर्ष पूर्व १९९९ की यादो में ले गये  जब वो १० वर्ष का था।

विद्यालय में ग्रीष्मावकाश की शुरुआत हो चुकी थी और इंग्लैंड में एकदिवसीय क्रिकेट विश्व कप चल रहा था।
मई की दोपहरी, घर में माँ और दादी अक्सर भोजन निपटा कर सो जाया करती थी। आशू और विशू बारी बारी से वीडियो गेम खेला करते और फिर दूरदर्शन पर मैच देखते। आशू मैच के दौरान अपनी क्रिकेट डायरी बनाया करता था। राजस्थान पत्रिका ने तभी से रंगीन खेल पृष्ठ छापना शुरू किया था, उन्ही में से कतरने काट काट कर पिछले साल की पुरानी डायरी में चुपकायी जाती। उसे अक्सर पिताजी की शेविंग वाली केंची से अखबार काटने के लिए डांट पिटा करती थी। ये बात तो उसे आज तक समझ नहीं आयी की कागज काटने से शेविंग वाली केंची की धार कैसे खराब हो जायेगी। माँ भी उसे कतरने काटने पर टोकती क्योंकि अब यह अखबार उनकी अलमारियों में बिछाने के काम भी नहीं आ सकते। इस कार्य के लिए दोपहर का समय ही सबसे मुफीद होता था जब शांति से वो अपना काम कर सकता था।

तब गूगल की सुविधा नहीं हुआ करती थी। सभी आंकड़े , नए पुराने कीर्तिमान अलग अलग रंगों के स्केच पेन से अंकित करके आशू अपनी डायरी बनाता था। विश्वकप में भारत अपना पहला मुकाबला दक्षिण अफ्रीका से हार चुका था, दूसरा ज़िम्बावे से था। सचिन पिता की मृत्यु की वजह से स्वदेश वापिस लौट गए थे। भारत ने उस खेल में  ५० से अधिक अतिरिक्त रन  दिए और आखिर में ३ रन से मैच हार गया। अब सुपर सिक्स मुकाबलो  में जाने के लिए भारत को सभी शेष मुकाबलो को जीतना ज़रूरी था। अगला एकदिवसीय केन्या से था जिसे द्रविड़ और तेंदुलकर के शतकों की बदौलत भारत ने आसानी से जीत लिया। पिता की मृत्यु के बाद यह सचिन का पहला वापसी मैच था। २६ मई को भारत का मुकाबला श्रीलंका से था। गांगुली -द्रविड़ की ताबड़तोड़ बल्लेबाजी भारत ने ३७३ रन का विशाल लक्ष्य रखा। गांगुली ने किसी भी भारतीय द्वारा एकदिवसीय में सर्वाधिक रन बनाने का कीर्तिमान अपने नाम किया। भारत की पारी समाप्ति पर आशु अपने भाई विशू के साथ कॉलोनी के मित्रो के साथ खलने चला गया। घर में उस दिन एक छोटा समारोह था जिसमे कुछ मेहमान आने वाले थे। आशु के पिताजी ने घर के बाहर बगीचे में मैच देखने की व्यवस्था की थी। आशु जब खेलके लौटता हैं तो वहां माहौल बदला हुआ सा था।

भारत -श्रीलंका मुकाबला छोड़कर सब समाचार सुन रहे थे। परिवार के वरिष्ठों की बातें खेल से हटकर पाकिस्तान और कश्मीर पर जा अटकी। यही पहली बार था जब उसने करगिल, मुजाहिद्दीन और घुसपैठिये जैसे शब्द सुने। अभी तक कश्मीर से हर रोज़ कोई न कोई छुटपुट घटना की सूचना आती रहती थी। उसके पिताजी भी पिछले ही वर्ष कश्मीर किसी कार्य के सिलसिले में गए गए थे और उसके लिये कश्मीर विलो का बल्ला लेके आये थे। परंतु आज मामला कुछ ज्यादा ही गंभीर था। एक दो बार पूछने के बाद बाबा ने उसे बताया की भारत और पकिस्तान में जंग की आधिकारिक शुरुआत हो गयी हैं जिसका नाम ऑपरेशन विजय हैं। उसी दिन भारत ने कारगिल की पहाड़ियों पर बैठे घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए वायुसेना के इस्तेमाल की इजाजत दी। रात को पिताजी ने उससे एटलस मंगवाई और दोनों भाइयो को बैठा के करगिल और आस पास के इलाको के बारे में समझाया।

उस दिन से काफी कुछ बदल गया। सवेरे अखबार आते ही अब १४ वे पृष्ट से ध्यान पहले पृष्ट पर आ गया। हर रोज़ सीमा पर जवानों के शहीद होने की खबरे आने लगी। शहर से सेना में कप्तान काफी दिनों से लापता थे। दुश्मन द्वारा कुछ जवानों के शवो को क्षत विक्षित करने की खबरे देखकर उसका दस वर्षीय बाल मन अक्सर गुस्से से भर जाता था। राज्य भर में कारगिल में शहीद हुए जवानों के शव आने की शुरुआत हो गयी। अखबार " जब तक सूरज चाँद रहेगा" जैसे नारो और अंत्योष्टि की खबरों से अटे पड़े थे। नजदीकी छावनी से अक्सर सेना के ट्रकों  और टेंको के, सीमा की तरफ सञ्चालन की आवाज़ घर तक पहुंचा करती थी। दोनों भाई सायकिल पर उनको देखने निकल पड़ते और तब तक जय हिन्द के नारे लगते और तालिया बजाते जब तक वे आँखों से ओझल न हो जाए।

विश्व कप में अब भारत के साथ साथ पकिस्तान के मुकाबलो में भी रूचि बढ़ गयी। भारत, श्रीलंका के बाद इंग्लैंड को हराकर अगले दौर में प्रवेश कर चूका था। यूं तो पकिस्तान भी अंतिम छह: में स्थान बनाने में कामयाब रहा परंतु बहुत कमज़ोर मानी जाने वाली बांग्लादेश से उसकी हार ने देश को काफी ख़ुशी दी। खेल के बाद टीम के कप्तान वसीम  अकरम ने कहा "वी लॉस्ट तो आवर ब्रदर्स", भारत में मजाक चल पड़ा कि जिस दिन ये हमसे हारेगा बोलेगा "वी लॉस्ट तो आवर फादर्स " , भारत के लिए अब पकिस्तान से मुकाबला जीतना बेहद अहम था।  सीमा पर जब देश युद्ध में हो तो क्रिकेट में दुश्मन से हार शायद ही कोई भारतीय पचा पाता। अहसास था की भारत भले ही विश्व कप में आगे न बढे परंतु पाकिस्तान को पटखनी ज़रूर दे। ८ जून १९९९ को पहले बल्लेबाजी करते हुए भारत ने २२७ का साधारण लक्ष्य रखा जो सईद अनवर की तेज शुरुआत के बाद और भी बौना साबित हो रहा था।  परंतु श्रीनाथ और वेंकटेश की धारदार और असाधारण गेंदबाज़ी ने भारत को खेल में बनाये रखा। मोईन खान का विकेट गिरते ही भारत में दिवाली का दौर शुरू हो चूका था। वेंकेटेश प्रसाद का २७/५ जीवन का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा। भारत जो अपने आगे के मुकाबले हार कर प्रतियोगिता से बाहर हो गया था, उसके  के लिए यही विश्व कप की जीत थी। पकिस्तान विश्व कप के निर्डनायक मुकाबले तक पहुंचा और ऑस्ट्रेलिया से हार गया।
 दूसरी तरफ करगिल में अभी तक भारत को सीमा पर कोई बड़ी सफलकता नहीं मिली थी। परंतु शायद क्रिकेट की जीत ने सीमा पर लड़ रहे जवानों पर मनोवैज्ञानिक असर तो डाला ही। जल्द ही १३ जून को भारत को तोलोलिंग की पहली बड़ी सफलता मिली और कुछ हफ़्तों बाद टाइगर हिल पर भारतीय ध्वज फहराया। इसके बाद के महीने भर में भारत ने लगभग सभी बड़ी चोटियों पर पुनः अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। चोटियों पर तिरंगा पकडे जवानों की तस्वीरे अब अखबार के पहले पृष्ठ पर थीं। इसी बीच ग्रीष्मावकाश समाप्त हो गया। विद्यालय में शहीदों के लिए विशेष प्रार्थना सभा हुई। २ महीने बाद कैप्टन अमित भरद्वाज का शव जयपुर लाया गया तो पूरे विद्यालय समेत शहर की आँखे नम थी । २६ जुलाई को प्रधानमंत्री ने युद्ध में विजयश्री की घोषणा कर दी। घर में शहीदों के लिए  दिया जलाया गया।

इन्ही यादो के झरोखों  के बीच गाडी अब द्रास में बने युद्ध स्मारक पर पहुँच चुकी थी। उसकी आंखो की पलकों पर हलकी बूँद सी आके रह गयी। उसके मन में विचार आया, एक १० वर्षीय बालक के लिए देशभक्ति और राष्ट्रवाद का अहसास कितना मासूम और सरल था। वो भले ही सेना में न हो और न ही किसी खेल में राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता हो परंतु अपने नागरिक धर्म और कर्तव्यों का निर्वहन करके भी सही माएने में देशभक्ति का परिचय दे सकते हैं। समझ नहीं आता आज कुछ किताबे पढ़कर और किसी विचारधारा से ओतप्रोत उसी के हमउम्र २६-२७ वर्षीय देश के खिलाफ नारा लगाने और उसके टुकड़े टुकड़े करने की सोच रखने की हिम्मत कैसे जुटा लेते हैं।      


Friday, June 24, 2016

पोहा

वाजपेयी जी नाश्ते  को लेकर असमंजस की स्थिति में हैं और वो अपनी कविता  "ऊंचे पहाड़ पर पेड़ नहीं लगते"   ( http://kaavyaalaya.org/oonchai ) के माध्यम से "पोहे" पर  लिखते हैं।

इंदौर में नाश्ता नहीं होता,
न होता हैं लंच,
और न होता हैं डिनर,
सिर्फ होता हैं पोहा।

                  पोहा सिर्फ पोहा ;
                   जो ,होता हैं हल्दी सा पीला
                   और ठूंठ सा सूखा ;
                   खेलता  खिलखिलाता चिवड़ा
                    जिसका रूप धारण कर भीने भीने रोता हैं।

ऐसा पोहा जिसका
लॉन्ग भुजिया सेव
जीभ पर चटका भर दे,
ऐसा पोहा जिसका
जिसका कड़ी पत्ता,धनिया
रोम रोम में खुशबु भर दे,
अभिनन्दन का अधिकारी हैं ,
चटोरो के लिए आमंत्रण हैं ,
उसके लिए १२ रूपये दिए जा सकते हैं ,
               
                  किन्तु कोई भूखा
                  उससे पेट नहीं भर सकता,
                  न कोई थका मांदा बटोही,
                  खाकर पलभर पलक झपक सकता हैं।

सच्चाई यह हैं कि
केवल पोहा ही काफी नहीं होता,
पृथक से परिवेश,
चिवड़े से पोहा ,
सबको साथ जोड़ता हुआ,
सेव, भुजिया ,मूंगफली अनार को मिला लेना,
पोहे की महानता नहीं मजबूरी हैं।
बेस्वाद होने से चटकारो तक,
आकाश पातळ की दूरी हैं।

जरूरी ये हैं की
पोहे के साथ जलेबी हो लस्सी भी हो,
जिससे मनुष्य सिर्फ सुखा तिकट,
मुंह लिए न खड़ा रहे
जलेबी  से मिठास ले,
लस्सी से घुले मिले ,
और फिर स्वाद लेते चले।

                 जलेबी में खो जाना ,
                 लस्सी में डूब जाना,
                 पोहे में खुद को भूल जाना ,
                 अस्तित्व को अर्थ देता हैं ,
                 जीवन को सुगंध देता हैं।

नाश्ते को पोहे की नहीं ,
सब्जी कचोडी की ज़रुरत  हैं ,
इतनी भरी की लंच तक का काम कर दे ,
आँखों में थोड़ी सी नींद भर दे।
                 
                   किन्तु इतनी फूली भी नहीं,
                   कि पेट में गुड़ गुड़ कर दे।
                   कुछ और न  निगले,
                   कुछ और न  उगले।

हे प्रभु :
मुझे इतना कोलेस्ट्रॉल कभी न देना ;
जलेबी न खा सकूं , लस्सी न पी सकू
इतनी चिकनाई कभी मत देना।









Tuesday, June 7, 2016

" राहुल " शाह जफ़र


न किसी का नूर हूँ 







History repeats itself. Last Mogul Bhadur Shah Jafar was exiled to Yangoon but Last Gandhi voluntarily exiled to Bangkok writing Rahulnama.



ना किसी का नूर हूँ
ना किसी के दिल का करार हूँ ,
कांग्रेस के काम न आ सका
मै इंदिरा का पोता-ए-बेकार हूँ।

ना राजीव सा 'ग्लैमरौस' ,
ना नेहरू सा चार्म हूँ
एक गाल पर खड्डा लिए
दीदी के लिए पार्टी का रिफार्म हूँ।

मेरा उम्र ए दराज़ थोडा बड़ गया,
दोस्त भीम भी बिछड़ गया।
जो चमन बसाया जवाहर ने
मै उसकी चौथी पीढ़ी ए बेजार हूँ।

कोई मुझ से मिले क्यों,
कोई पॉवर का जहर चटायें क्यों
कोई प्रचार करने बुलाये क्यों
मैं लुटियन का बासी हुआ सत्ता का आचार हूँ।

मैं जनपथ रहू या रोम बसूँ
ना माँ मुझसे खुश ना पार्टी खुश मुझसे
कितनी बार फाइनल  'कमिंग औफ ऐज' कहूँ
मै क्यों जाके 7 आर सी आर रहूँ

न किसी का नूर हूँ
न किसी का करार हूँ----- -


राहुल शाह जफ़र


Friday, May 6, 2016

ऐन.एच.टी.वी



न्यू हस्तिनापुर टेलीविशन


हस्तिनापुर राज्य की स्थापना के साथ ही उसके चौथे स्तम्भ मीडिया का जन्म हुआ। शुरूआती वर्षो में सरकार द्वारा संचालित व्यास दर्शन और आकाशवाणी ही एकमात्र साधन थे। परन्तु दुर्योधन के युवराज बनने के बाद नव उदारवाद का दौर शुरू हुआ, मीडिया और केबल टीवी को निजी क्षेत्र के लिए खोल गया। इसी दौर में 'न्यू हस्तिनापुर टेलीविशन' तेजी से उभरता हुआ अपनी जगह बनता हैं।

ऐन.एच.टी.वी  की स्थापना संजय ने की।संजय की शुरुआत महाराज ध्रितराष्ट्र की BMW और AUDI रथो  के सारथि के तौर पर होती हैं।कुछ ही वर्षो में महाराज की सिफारिश से उसे व्यासदर्शन पर नौकरी मिल जाती हैं और वो "हस्तिनापर दिस वीक" जैसे कार्यक्रम की शुरुआत करता हैं । उदारवाद के बाद बदली हुयी परिस्थितियों और युवराज दुर्योधन की मदद से संजय प्राइवेट न्यूज़ चैनल का लाइसेंस प्राप्त करने में सफल होता हैं और ऐन.एच.टी.वी  की नीव डालता हैं।आगे चलकर संजय 'पुष्पक एयरलाइन्स' के साथ मिल कर एंटरटेनमेंट के क्षेत्र में कदम भी रखता है।इसी दौर में महाराज ध्रितराष्ट्र उन्हें अपना मिडिया सलाहकार भी नियुक्त करते हैं।

2002, महाभारत युद्ध को को चैनल का स्वर्णिम काल कहा जाए तो गलत नहीं होगा जब उसने TRP के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। संजय के पारिवारिक मित्र आधीरथ और राधा इसी दौरान बतौर रिपोर्टर कदम रखते हैं.
युद्ध के दौरान जहाँ  एक वर्ग उसकी तारीफ़ करता हैं वहां एक बड़ा वर्ग उसकी नकारात्मक, भड़काऊ, संवेदनहीन रिपोर्टिंग की आलोचना भी करता हैं। उस पर जॉर्नलिस्टिक एथिक्स को ताक पर रख पक्षपाती रिपोर्टिंग से वॉर एस्कलेट  करने के आरोप भी लगते हैं। ऐन.एच.टी.वी ने युद्ध के दौरान जान बूझकर 'घटोत्कच वध' और 'अभिमन्यु हत्याकांड' को दबाया, साथ ही 'गुरुद्रोण वध' और युवराज दुर्योधन के बहनोई  जयद्रथ के एनकाउंटर  को बड़ा चढा कर पेशकर कौरव समुदाय में अपनी जगह बनायीं। ऐन.एच.टी.वी पर ये आरोप भी लगा की उसने जयद्रथ एनकाउंटर के बाद बने कृपाचार्य कमीशन की रिपोर्ट के साथ छेड़खानी कर घटना के समय में बदलाव कर उसे फर्जी बताने का प्रयास भी किया।

पोस्ट कुरुक्षेत्र
अब समय काफी बदल गया हैं और हस्तिनापुर में महाराज युधिस्ठिर की सरकार हैं। कुरुक्षेत्र ग्राउंड लीज पर देने की एवज में उसके मालिक को और भगवान् कृष्ण के सहयोगी सुदर्शन को भी न्यूज़ चैनल का लाइसेंस मिल गया हैं और वो पूरी तरह महाराज के साथ हैं। सुदर्शन अपनी ज्यादा ही धारदार रिपोर्टिंग से विवादित ज्यादा हैं।

ऐन.एच.टी.वी  की TRP अब सबसे नीचे पायदान पर हैं और उस पर ५करोड़ सोने की अशर्फियों को लेकर फोरेक्स मापदंडों  की अवहेलना के मामले में  FEMA और ED की जांच का खतरा बना हुआ हैं। महाराज के प्रिय नकुल और सहदेव अक्सर उस पर इंटरव्यू और बाइट्स देते हुए नज़र आते हैं जिससे पांडव सेना काफी रोष में हैं। चैनल अक्सर महाराज को 'बुचर ऑफ़ कुरुक्षेत्र' और 'मिसोञनिस्ट हू गंबेल्ड हिज वाइफ' जैसे उपनाम देकर कौरव समुदाय में जगह बनाया हुआ हैं। संजय के लिए सबसे ज्यादा परेशानी स्वामी विदुर बने हुए हैं जो अभिमन्यु हत्याकांड की फिर से जांच करवाने के लिए उच्तम न्यायलय में अर्जी दे चुके हैं। उनका आरोप हैं कि  ऐन.एच.टी.वी  ने घटना ने दौरान अपनी रिपोर्टिंग से अभिमन्यु की लोकशन्स और जीपीएस कॉर्डिनट्स शत्रु सेना को मुहैया करा के देशद्रोह का कार्य किया हैं। चैनल की नयी मुसीबत संजय द्वारा ,VVIP रथो के लिए पूर्व महारानी गांधारी के मायके से ईरानी घोड़ो की खरीद में १२५ करोड़ अशर्फियों की दलाली लेने को लेकर हैं।


अधिरथ और राधा के चैनल को द्वारका के एक बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट ने खरीद लिया हैं। संजय अब सक्रिय पत्रकारिता से निवृत हो चुके हैं। महाराज युधिस्ठिर की सरकार के दमनचक्र के विरोध में ऐन.एच.टी.वी अपनी स्क्रीन काली कर दी हैं और उसे सिर्फ पूर्व राजमाता गांधारी काली पट्टी बाँधे देखती रहती हैं।



*ब्लॉग की प्रेरणा शिव मिश्रा  जी द्वारा लिखित  "दुर्योधन की डायरी से" ली गयी हैं।
 



Tuesday, March 3, 2015

प्रत्युक्ता


इंजन की सीटी पर गार्ड ने झंडी लहराई
खड़ा था दरवाज़े पर, यादें घूमड़ आई|
बढ़ी आगे गाड़ी, अपनो की तस्वीर धुन्धुलाई .
पलकों की खिड़की पर कुछ बूँदें मिलने आईं|

दो पटरियाँ जो कभी ना मिलेंगी,
ले चली मुझे मिलाने,
एक नये पते से एक नये सपने से,
कुछ नये लोग, मुझ ही जैसे मुझसे|

 पहुँचा अपनी मंज़िल पर,
लगा मिला हूँ कुछ आइनो से,
एक अजीब सी थी झुंझलाहट,
अकेलेपन में बसी सासों की थी आहट|

इसी बीच एक तूफान उठता है,
खामोशी तोड़ता दिलों को जोड़ता.
मुझे झक्झोर जाता है|
शायद यही उधभव कहलाता है|
तूफ़ा में अपनो से बिछड़े, बहुतों से मुलाकात हुई
उनसे मिलके लगा जैसे अपनों से बात हुई|
कोई मेरी ही उमर का, नाम अंकित
करने का संकेत देता है|
अपने आप से अपेक्षा करती
गुमसुम श्रेया भी है|

अमेया की सुनकर लगा
प्र-कृति से ज़्यादा बोल गया,
अनूप अनुराग भरी यादों को संजोने में खो गया|
ऐक रॉबिन-हुड नवी भी है,
खुद को ताराश्ते अगम राहुल और तृप्ति भी हैं|
बातों के मांझो में उलझाता तनुज है,
उसका लहज़ा कानों में  अमृत घोलता है|

सावन के मौसम में शरद सा एहसास है
खिलखिलाती अमीशा किरणो का आभास है|
मेरे सवालों में अटकी,
मेरी मुस्कुराहट का जवाब इन्ही में पता हूँ
शायद इन से ही मिलके प्रतियुक्ता कहलाता हूँ

for NICMAR juniors batch 2015



Tuesday, January 27, 2015

कार्टूनों का लक्ष्मण

कार्टूनिस्ट लक्ष्मण हमारे बीच नहीं रहे। हम कार्टूनों का कार्टून बनाने वाला एक कार्टून हमारे बीच से चला गया। शायद हम सबके ऊपर बैठा कार्टूनिस्ट ये सोच रहा होगा की उसके बनाये सबसे खूबसूरत कार्टून "पृथ्वी" पर अब कार्टून "लोग" उसके कार्टून देख कर आहत हो जाते हैं तो लक्ष्मण या शार्ली हेब्दों जैसे कार्टूनो की क्या ज़रुरत हैं, उन्हें ऊपर ही  बुला लेता हूँ मजे से बैठ कर खुदके खूब कार्टून बनवायुंगा और खूब हसूंगा। 

कार्टून अभिव्यक्ति की वो विधा हैं जिसमे आदमी आपको दो पल टेडी नाक, बड़े कान, मोटा पेट जैसी चीज़ दिखा कर हँसाता हैं और फिर आपको सोचने पर मज़बूर कर देता हैं। और जब व्यक्ति सोचने लगता हैं तो अच्छे अच्छे तानाशाहों को सिंहासन खाली करने पड़ते हैं। लक्ष्मण किसी भी विचारधारा के हो उनके कार्टून कभी किसी की हिकारत नहीं करते थे, किसी को आहत नहीं करते थे। उन्होंने अपनी एक लक्ष्मण रेखा उकेरी जिसे हम कॉमन मैन कहते हैं, जिसे सत्ता/राजनेता रुपी सीता रोज़ लांघ जाती हैं और रोज़ लक्ष्मण का कॉमन मैन उसे वापिस अपनी सीमाओ में आने को कहता हैं उसे चेतता हैं कि वो उसे न लांघे। उनका कॉमन मैन सवाल पैदा करता था। वो व्यवस्था से दुखी होता था परन्तु कुण्डित नहीं होता था, विद्रोही नहीं होता था। व्यवस्था को उखाड़ फेकने से ज्यादा उसे परिवर्तित करने पर ज़ोर देता था। वो भोला हैं, एक नज़र में सत्ता से ठगाया हुआ उसका हाव भाव भौचक्का रहता हैं और फिर वो संभालता हैं और कहता हैं की जनता सब जानती हैं। वो हार नहीं मानता, उसका भाव हमे को फिर से खड़े होने का जज़्बा देता हैं। 

लक्ष्मण से कभी नहीं मिला पर चित्रो को कॉपी करने की आदत मुझे उनपर थोड़ा सा लिखने का हक़ तो देती हैं। अपनी इंजीनियरिंग क्लास में जब कुछ नहीं सूझता तो कार्टून कॉपी करने लगता और इस दौरान उनके भी कार्टून छापने (कॉपी, री-ड्रा ) की कोशिश की। उनके जाने से मन दुखी हैं। ऊपर शायद बालासाहब और लक्ष्मण बैठ कर मस्त जाम छलका रहे होंगे।

पर लक्ष्मण का कॉमन मैन नहीं मरा हैं उसका रचियता मात्र हमारे बीच नहीं हैं, और जब तक व्यक्ति सोचता रहेगा और भागदौड़ और निराशा के बीच हंसता रहेगा लक्ष्मण का कॉमन मैन जिन्दा रहेगा, वो खुश भी होगा, दुखी भी होगा, हंसाएगा भी, रुलाएगा भी और कहेगा पगले ऊपर वाले दिमाग सोचने ने लिए दिया हैं और मुँह मुस्कुराने के लिए। तो हँसते  हँसते सोचते रहिये।   

Wednesday, January 21, 2015

सरकार में मतभेद का ओबामा कनेक्शन

नईदिल्ली ,
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की यात्रा से पूर्व,आठ महीने पुरानी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में बड़ा मतभेद उजागर हुआ हैं। इस मतभेद में मूल में केंद्र सरकार को दो वरिष्ठतम मंत्रियो के बीच नंबर दो की लड़ाई के रूप मे देखा जा रहा हैं। घटना मंगलवार देर रात १९ जनवरी की हैं जब सरकार में ग्रह मंत्री, राजनाथ सिंह प्रधानमंत्री से मिलने उनके निवास  स्थान ७ रेसकोर्स रोड पहुंचे। मुलाकात की वजह सीमा पर ताजा गोलीबारी की घटनाओ को बताया गया। परन्तु भोकाल टाइम्स के विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक मुलाकात में राजनाथ ने राष्ट्रपति ओबामा की यात्रा से जुडा मुद्दा उठाया । सिंह ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया की वे ओबामा से उनके लिए आते वक़्त ड्यूटी फ्री से ६ जैक डेनियल की बोतल लाने आग्रह  करे। प्रधानमंत्री से ऐसी ही सिफारिश सिंह ने उनकी सितम्बर की अमरीका यात्रा के दौरान भी की थी लेकिन विमान में बैग की  वजन सीमा ४० किलो पूरी होने की वजह से मोदी उनकी ये ख्वाहिश पूरी नहीं कर पाये थे। उस समय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपनी ५ किलो बिंदिया मोदी के बैग में रखवाई थी परन्तु मीडिया ( भोकाल टाइम्स नही ) ने उसे प्रधानमंत्री की राजनाथ से उनके पुत्र पंकज सिंह की कार्यशैली पर नाराजगी से जोड़ दिया था। सूत्रों पर विश्वास करें तो तैयारी से आये राजनाथ को मोदी मना नहीं कर पाए और उन्हें ओबामा से बात करने का आश्वासन देकर ही वापिस भेजा । 


सिंह से मोदी ने जब पूछा कि ड्यूटी फ्री से सिर्फ २ लीटर ही शराब लायी जा सकती हैं, जिस पर राजनाथ ने स्पष्टीकरण दिया की सी.आई.एस.एफ उनके मंत्रालय के अंतर्गत आती हैं और वो हवाई अड्डे पर इसका इंतज़ाम कर देंगे। प्रधानमंत्री ने वजन का बहना बनाने पर राजनाथ ने उन्हें बोतल दिल्ली IGI हवाईअड्डे से खरीदने की सलाह दी ना कि JFK हवाईअड्डे से। मन में अपनी बात मनवाने की ठान कर आये सिंह ने जब मोदी से उसी समय ओबामा से बात करने की बात कही तो प्रधानमंत्री ने देर रात होने का हवाला दिया जिस पर राजनाथ ने अमरीका में सुबह होने की बात की। मोदी ने पलटकर प्रातः शराब की बात करने पर अपनी शंकाए जताई। यहाँ तक की मोदी से सिंह की मुलकात के दौरान  सरसंघचालक मोहनराव भागवत का फ़ोन भी आया और उन्होंने राजनाथ को बड़े फैसलों में साथ लेने की सलाह दी। संघप्रमुख ने सामान न आने पर उत्तरप्रदेश में ठाकुरो के बड़े वोट बैंक के नाराज़ हो जाने की तरफ आगाह किया।अपने को हाशिये पे धकेले जाने से दुखी ग्रहमंत्री इस बार मोदी से आश्वासन ही लेकर बाहर  आये। 

पर यह बात यही नहीं रुकी । प्रधानमंत्री ने जब इस घटना का जिक्र सरकार में वित्तमंत्री और संकटमोचक अरुण जेटली से किया तो उन्होंने भी मोदी को ओबामा से ६ I Phone ६ लाने का आग्रह करने को कहा। इसे पहली नजर में  राजनाथ के समर्थको द्वारा उनका सामान रोकने की सोच समझी रणनीति के तौर पर समझा जा रहा हैं। 

प्रधानमंत्री ने देश के चालू  वित्तीय घाटे  के लक्ष्य न पूरा करने  का हवाला देते हुए महंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण विदेशो से आयात करने पर चिंता जताई और अपनी और से जेटली को चेताया। अपने हर फैसले में वित्तमंत्री की राय को अहमियत देने वाले मोदी का ये बयान उनकी अरुण जेटली द्वारा एनडीटीवी और बरखा दत्त को बारबार दिए जा रहे इंटरव्यू से नाराजगी बताया जा रहा हैं। इस कथन से चिंतित, पेशे से वकील जेटली जल्द ही मोदी की नाराजगी समज गए और भविष्य में ऐसा न होने भरोसा दिलाया । मोदी ने भी " मेक इन इंडिया " की वकालत करते हुए उनहे आश्वासन दिया की वो ओबामा को २ फ़ोन लाने को  बोल देंगे। 

इन घटनाओ से साफ़ हैं की सरकार शीर्षतम मंत्रियो के बीच किस कदर गहरे मतभेद हैं और अविश्वास का माहौल हैं। मंत्री अपने को सरकार में दुसरे स्थान पर स्थापित करने के लिए  किस हद तक जा सकते हैं। इस खबर की पुष्टि IBN ७ के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर और आम आदमी पार्टी के कद्दावर नेता आशुतोष ने अपने सूत्रों से की हैं और सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किये हैं। इसी बीच अमेरिकी सरकार में ख़ुफ़िया विबाग के अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया हैं की वाइट हाउस को पीएमओ से इस बाबत फ़ोन आ चूका हैं और राष्ट्रपति ओबामा ने उन्हें अपने बैग में जगह होने पर उनका सामान लेकर आने का भरोसा दिलाया हैं। खबर तो यहाँ तक हैं की फोटोग्राफी के शौक़ीन प्रधानमंत्री स्वयं अपने लिए अमरीका से NIKON 5200D कैमरा मंगवाना चाह रहे थे जो वो सितम्बर में अमरीकी दौरे पर व्यस्तता के कारण नहीं खरीद पाये थे परन्तु अपने शीर्ष  कैबिनेट सहयोगियों के लिए उन्होंने अब मन बदल दिया है। उन्होंने भारतीय मज़दूर संघ के विरोध को नजअंदाज़ कर फ्लिपकार्ट पर आर्डर कर दिया हैं। इसे उनके सरकार में संघ परिवार के बढते प्रबाव के रोकने की कोशिश माना जा सकता है जो ऐसी वेबसाइट पर प्रतिबंध की मांग कर रहा हैं।  

वही दूसरी तरफ अमरीका की प्रथम महिला मिशेल ओबामा ने मोदी की सितम्बर में हुई यात्रा में राजकीय भोज में शामिल न हो पाने पर खेद जाताया हैं। उस समय उन्होंने भोज में शामिल न होने की वजह अस्वस्थता को  बताया था परन्तु  अब इस बात का खुलासा हुआ हैं की  नाराज़गी की वजह प्रधानमंत्री का उनके लिए गुजरात से फाफड़ा और ढोकला न लाना थी।लेकिन अब मोदी के निमंत्रण से उत्साहित ओबामा दंपती पुरानी बातो को भूल कर भारत आने को तैयार हैं। देखना ये हैं की क्या प्रधानमंत्री अपने राजनैतिक कौशल का परिचय देते  हुए ये जेटली और राजनाथ के बीच के मतभेद सुलझा पाएंगे और दूसरी  तरफ राष्ट्रपति ओबामा अपने साथ इतना सामान ला पाएंगे। सबकी नजरे अब २५ जनवरी को मोदी-ओबामा की मुलाकात पर टिकी हैं जिससे प्रधानमंत्री के घरेलू मोर्चे और अंतराष्ट्रीय मामलो को एकसाथ सुलझाने की क्षमता का पता चलेगा।